bhagavad gita in hindi

Bhagavad Gita Saar in Hindi

Bhagavad Gita Saar in hindi आप का जीवन बदल देगा जरूर पढिए।

Bhagavad Gita ka Saar in hindi जो भगवान श्री कृष्ण द्वारा भगवद गीता मे अर्जुन को बताया गया जिसमे भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपने कर्तव्य के बारे मे बताया। जब अर्जुन युद्धभूमि कुरुक्षेत्र मे अपने कर्तव्य का त्याग करने की सोच रहा होता है इस युद्ध से हार मानने की बात भगवान से करता है तब श्री कृष्ण अर्जुन को मार्गदर्शन करते है। और बताते है की कैसे उसे अपने कर्तव्य के प्रति प्रामाणिक रहकर अपना कार्य सफल करना चाहिए। 

आरंभ

कृष्ण अर्जुन संवाद

हे अर्जुन! इस असमय में (युद्ध क्षेत्र में, जबकि युद्ध के लिए दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं) तुझे मोह किसलिए हुआ है? क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषों ने भी कभी इसका आचरण नहीं किया और यह न तो स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला है न कीर्ति देने वाला है। हे अर्जुन! इस असमय में (युद्ध क्षेत्र में, जबकि युद्ध के लिए दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं) तुझे मोह किसलिए हुआ है? क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषों ने भी कभी इसका आचरण नहीं किया और यह न तो स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला है, न कीर्ति देने वाला है।

इसलिए हे पार्थ! तू नपुंसकता को प्राप्त मत हो। तेरे लिए यह उचित नहीं है।  हे परंतप! तू हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़ा हो।इस पर अर्जुन ने कहा कि हे मधुसूदन! युद्ध के इस मैदान में मैं भीष्म पितामह व आचार्य द्रोण पर किस प्रकार बाण चला पाऊंगा। क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही मेरे लिए पूजनीय हैं। अतः इन महानुभाव गुरुजनों को मारने की अपेक्षा मैं भिक्षा का अन्न भक्षण करना कल्याणकारी समझता हूं। क्योंकि गुरुजनों को मारकर मैं इस लोक में रक्त से सने अर्थ व काम रूपी भोगों का ही तो उपभोग करूंगा।

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हमें यह भी नहीं पता कि हमारे लिए युद्ध करना श्रेष्ठ है या युद्ध न करना। अथवा हमें यह भी नहीं पता कि हम जीतेंगे या वे ही हमें जीत लेंगे। जिन्हें मारकर हम जीवित नहीं रहना चाहते, वही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं। अतः कायरतारूपी दोष के कारण अपने क्षत्रिय स्वभाव से गिर चुका मैं धर्म-अधर्म के बारे में आपसे पूछता हूं कि जो भी साधन मेरे लिए कल्याणकारी हो, वही मुझे बतलाएं-मैं आपका शिष्य हूं, अतः आपकी शरणागत हूं। आप मुझ पर शासन करें, मुझे मेरा सही मार्ग सुझाएं।

(हे गुरुदेव!) पृथ्वी का एकछत्र, धन-धान्य से आपूरित राज्य व देवताओं का स्वामित्व पा लेने पर भी मुझे वह साधन दिखाई नहीं पड़ता जिससे इंद्रियों को सुखा देने वाले (शरीर और मन को अशक्त करने वाले) मेरे इस शोक को दूर किया जा सके। मेरा यह धर्म विषयक संताप तो बढ़ता ही जा रहा है।

bhagavad gita saar hindi
श्री कृष्ण अर्जुन

संजय ने कहा कि हे राजन! इतना कहकर निद्राजयी (नींद को जीत लेने वाला) अर्जुन सर्वांतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण से बोला कि हे गोविंद मैं युद्ध नहीं करूंगा। फिर वह मौन हो गया। तत्पश्चात हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! दोनों सेनाओं के मध्य शोकाकुल अर्जुन से भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा। हे अर्जुन! जो लोग शोक करने के योग्य हैं ही नहीं, उनके लिए तू शोक करता है। इस पर भी पंडितों की तरह बोलता है, लेकिन पंडितजन (बुद्धिमान या विद्वान) ऐसे लोगों के लिए कभी शोक नहीं करते जिनके प्राण निकल चुके हैं और जिनके प्राण नहीं निकले हैं।

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वस्तुत: आत्मा अमर है, इसका क्षय नहीं होता। अतः शोक करना व्यर्थ है। ऐसा नहीं है कि किसी काल में मैं नहीं था, तू नहीं था, या ये सब राजा भी नहीं थे अर्थात थे। और ऐसा भी नहीं है कि भविष्य में कभी हम रहेंगे ही नहीं। इस शरीर में जीवात्मा की जैसे बाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसे अन्य शरीर की भी प्राप्ति होती है, इसलिए बुद्धिमान या धीरजन इस विषय को लेकर कभी मोह में नहीं पड़ते। हे कौंतेय! इंद्रिय व विषयादि सुख-दुख तो सर्दी गरमी देने वाले हैं। ये उत्पन्न होते हैं, नष्ट होते हैं और अनित्य हैं। अतः हे भारत! उनको तू सहन कर।

कृष्ण अर्जुन संवाद

हे पुरुषश्रेष्ठ! सुख-दुख को सम समझने वाले जिस धीरजन को इंद्रिय व उसके विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वही मोक्ष पाने का अधिकारी होता है। हे अर्जुन! जो असत्य है उसका अस्तित्व नहीं होता। वह नाशवान है। लेकिन जो सत्य है, उसका कभी अभाव ही नहीं होता, क्योंकि सत्य कभी नष्ट नहीं होता। ज्ञानीजनों द्वारा सत व असत दोनों ही वस्तुओं का तत्व देखा हुआ है। इस रीति से तू अविनाशी तत्व को जान। उसी से यह दृश्यमान जगत व्याप्त है, क्योंकि उस अविनाशी तत्व को नष्ट करने की क्षमता किसी में भी नहीं है।

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जितने भी शरीर हैं, ये सभी नाशवान हैं और ये शरीर अविनाशी, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के हैं। जीवात्मा का कभी नाश नहीं होता। अतः हे अर्जुन! तू युद्ध कर वे लोग जो आत्मा को मारने वाला समझते हैं और वे लोग जो आत्मा को मरने वाला समझते हैं, दोनों ही अनभिज्ञ हैं, अज्ञानी हैं। कारण कि आत्मा न तो किसी को मारता है और न ही कोई उसे मार सकता है। आत्मा का न तो किसी काल विशेष में जन्म होता है। और न ही मरण होता है तथा न ही यह उत्पन्न होकर पुनः होने वाला है। कारण कि आत्मा तो अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, फिर शरीर नष्ट हो जाने पर भी इसका मरण कैसे हो सकता है।

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कुरुक्षेत्र युद्धभूमि

हे पार्थ! जो पुरुष आत्मा को अविनाशी, नित्य, जन्मरहित, अव्यय रूप से जानता है, वह कैसे और किसको मरवाता है और किसको कैसे मारता है? अर्थात वह जब जानता है कि आत्मा मरने वाला नहीं, तो वह किसी को मारने की चेष्टा या मरवाने की प्रेरणा क्यों करेगा। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नूतन वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार जीवात्मा भी पुराने या वृद्ध शरीर को त्याग कर नए शरीर को धारण करता है। आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकता, अग्नि उसे जला नहीं सकती, जल उसे गीला नहीं कर सकता और वायु भी उसे सुखा नहीं सकता।

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कारण कि आत्मा अच्छे अदाहा, अक्लेद्य, अशोष्य है और यह नित्य, सर्वव्यापी, अचल, सनातन व स्थिर है। आत्मा को अव्यक्त, अचिंत्य, निर्विकार कहा गया है। अतः हे अर्जुन! तू आत्मा को इस प्रकार का जानकर शोक करने योग्य नहीं है। हे महाबाहो! यदि तू ऐसा मानता है कि आत्मा तो सदा जन्मता-मरता रहता है। ऐसा सोचने या मानने पर भी तुझे शोक करना उचित नहीं है। कारण कि यदि ऐसा मान भी लिया जाए तो जन्मने वाला निश्चित समय पर मरता अवश्य है और जो मरता है, उसका जन्म भी होता है। इसलिए भी तुझे शोक करना उचित नहीं है।

हे अर्जुन! संसार में जितने भी प्राणी हैं, जन्म से पूर्व अव्यक्त थे अर्थात शरीर रहित थे। इसी तरह मरने के बाद भी अव्यक्त हो जाते हैं। तब भी शरीर रहित होते हैं। इस तरह यह शरीर मध्य की स्थिति है। तब फिर इस विषय में शोक करने का क्या औचित्य है ? हे अर्जुन! यह आत्मतत्व बहुत गूढ़ है। इसे कोई तो आश्चर्य की तरह देखता है और कोई इसका बखान आश्चर्य की तरह करता है। इसी तरह कोई महापुरुष इस आत्मतत्व को आश्चर्य की तरह श्रवण करता है तथा कोई तो सुनकर भी आत्मतत्व को नहीं जान पाता। हे भारत! आत्मा सभी शरीरों में अवध्य है अर्थात इसका वध नहीं किया जा सकता। इसलिए सभी जीवों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है।

कृष्ण अर्जुन संवाद

निज धर्म को देखकर भी हे अर्जुन! तुझे भय नहीं मानना चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय का धर्म या कर्तव्य धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर अन्य कोई नहीं है। हे पृथापुत्र, पार्थ! स्वतः प्राप्त व स्वर्ग के द्वारों को सहजरूप से खोलने वाले इस तरह के युद्ध को भाग्यशाली क्षत्रिय ही प्राप्त करते हैं।अब यदि तू इस धर्ममय युद्ध को नहीं करेगा या यह युद्ध नहीं लड़ेगा तो निजधर्म व यश को गंवाकर पाप का भागी बनेगा। इतना ही नहीं लोग दीर्घकाल तक रहने वाले तेरे अपयश का बखान करेंगे।

यह भी तथ्य है कि सम्माननीय व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़कर है।युद्ध न करने की स्थिति में वे लोग भी तुझे तुच्छ समझेंगे, जिनकी दृष्टि में तू परम सम्माननीय है। ऐसे महारथी तुझे युद्ध से भयभीत हुआ जानकर युद्ध न करने वाला मानेंगे।और सुन, तेरे शत्रु ही तेरी सामर्थ्य (क्षमता) की निंदा करते हुए न कहने वाली बातें कहेंगे। इससे जो दुख तुझे प्राप्त होगा, उससे बढ़कर अन्य दुख और क्या होगा ?

Bhagavad Gita Saar in hindi

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युद्ध में यदि तेरी मृत्यु हो गई तो तुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी अथवा युद्ध जीतकर तू पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इसलिए हे कौंतेय! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा। सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान मानकर तू युद्ध के लिए तैयार हो। इस प्रकार किए गए युद्ध से तुझे पाप नहीं लगेगा।हे पार्थ! यह बुद्धि तुझे ज्ञानयोग के विषय में दी गई है। अब इसी को तू कर्मयोग के विषय में सुन। इसके द्वारा तू कर्मबंधनों को पूर्णतः त्याग देगा।कर्मयोग में बीज का नाश नहीं होता और न ही फल रूपी दोष लगता है। वरन कर्मयोग रूपी धर्म का अल्प साधन महाभय से रक्षा करता है। हे अर्जुन! कर्मयोग रूपी कल्याण के मार्ग में निश्चयात्मिका बुद्धि केवल एक होती है। लेकिन जो अस्थिर विचार वाले हैं, ज्ञानहीन हैं, कामी हैं उनकी बुद्धियां वस्तुतः बहुभेद वाली व अनगिनत होती हैं।

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श्रीकृष्ण

हे पार्थ! जो भोगों में ही संलिप्त रहते ह। जिनकी निष्ठा कर्मफल के प्रशंसक वेद वाक्यों में ही हैजो इन्हीं को सब कुछ मानते हैं, जो प्राप्त करने योग्य वस्तु स्वर्ग को ही मानते हैं, जिनके लिए स्वर्ग से बड़ी कोई वस्तु है ही नहीं, ऐसे कथनकर्ता अज्ञानी हैं और अज्ञानतावश ही पुष्पित वाणी (दिखावटी शोभायुक्त वाणी) कहा करते हैं। भोग और ऐश्वर्य के प्रति आकृष्ट चित्त वाले अज्ञजनों के अंतःकरण (चित्त) में निश्चयात्मिकता बुद्धि का अभाव रहता है। हे अर्जुन ! वेद त्रिगुणों के कार्य रूप भोगों व उनके साधनों के प्रतिपादनकर्ता हैं। अतः तू सुख-दुख आदि द्वन्द्वों से रहित होकर नित्य वस्तु अर्थात परमात्मा में स्थित हो, योग (अप्राप्ति की प्राप्ति) व क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा) को न चाहने वाला व आत्मपरायण है।

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 क्योंकि जिसे परिपूर्ण बड़े जलाशय की प्राप्ति हो जाए तो फिर उसे अपूर्ण व लघु जलाशय से क्या प्रयोजन रह जाता है। ठीक इसी तरह जिसे ब्रह्म के आनंद की प्राप्ति हो जाए तो फिर उसे वेदों से क्या प्रयोजन रह जाता है। इसलिए हे अर्जुन ! तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है। कर्म के फल में नहीं। अतः तू कर्मफल का हेतु मत बन अर्थात कर्मफल में आसक्ति न रख, लेकिन कर्म न करने में भी आसक्ति न रख। अर्थात् कर्म का त्याग भी मत कर।हे धनंजय! आसक्ति का परित्याग करके व सिद्धि असिद्धि में समबुद्धि रखकर योगस्थ हुआ तू कर्मों को कर। इसी को समत्व योग कहते हैं।कर्म को समत्व बुद्धि योग से निम्न स्तर का कहा जाता है। अतः हे धनंजय! तू बुद्धियोग का आश्रय ले। कारण कि जिन्हें फल की कामना होती है, उन्हें अति दीन कहा जाता है।

Bhagavad Gita Saar in hindi

कृष्ण अर्जुन संवाद

जिसकी समबुद्धि है व जो पाप-पुण्य में लिप्त नहीं होता है। इनको वह इसी लोक में त्याग देता है। इसलिए तू समत्व बुद्धियोग में लग जा। यह योग ही कर्मपाश से छूटने का एकमात्र साधन है। जिन ज्ञानीजनों की समबुद्धि है, वे कर्मोत्पन्न फलों का त्याग करके जन्म रूपी बंधन से मुक्त होकर विकार रहित अमृतमय पद को प्राप्त होते हैं अर्थात उनकी मुक्ति हो जाती है।हे कौंतेय! जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़ को पार कर जाएगी तब तू श्रवणीय व श्रुत (सुने हुए) के वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा अर्थात भोगों से तुझे वैराग्य हो जाएगा।

अनेक बातों या वचनों को सुनने से भ्रमित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्म स्वरूप में स्थिर हो जाएगी तभी तुझे योग की प्राप्ति होगी, तभी तुझमें समत्व बुद्धि उत्पन्न होगी तथा परमात्मा से तेरा नित्य संयोग हो जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण के सारगर्भित वचनों को सुनकर अर्जुन ने पूछा कि हे केशव! समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि (स्थितप्रज्ञ) पुरुष का लक्षण क्या है? ऐसा पुरुष कैसे बोलता ? कैसे बैठता है? कैसे चलता है ? अर्थात वह कैसे व्यवहार करता है, यह बताएं। अर्जुन की जिज्ञासा को शांत करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन! जब मनुष्य संपूर्ण मनोकामनाओं का परित्याग कर देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ अर्थात स्थिर बुद्धि वाला कहलाता है।

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दुख आ पड़ने पर भी जिसके मन में उद्वेग नहीं होता और सुख मिलने पर भी जो सदैव निस्पृह रहता है तथा जिसके रोग, भय, क्रोध नष्ट हो चुके हैं, ऐसा मुनि (मनन करने वाला) स्थिर बुद्धि या स्थितप्रज्ञ कहलाता है।जिसका किसी से कोई लगाव नहीं है और जो अच्छी या बुरी वस्तु को प्राप्त करके भी न तो प्रसन्न होता है और न ही दुखी होता है अर्थात द्वेष नहीं करता है, वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है। और भी सुन, जिस प्रकार कछुआ अपने सभी अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार जब मनुष्य इंद्रियों को उनके विषयों से विमुख कर लेता है तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।

इंद्रियों को विषयों से विमुख करने पर विषयों से छुटकारा तो मिल जाता है। लेकिन आसक्ति बनी रहती है। फिर भी जो स्थितप्रज्ञ है उसकी आसक्ति भी परमात्मा से साक्षात्कार हो जाने से छूट जाती है। हे अर्जुन! आसक्ति, लगाव या राग नष्ट न होने पर वे इंद्रियां, जिनका स्वभाव ही प्रमथन करना है, साधनारत मनुष्य के मन का बलात हरण कर लेती हैं। इन सभी को वश में करके, समाहित चित्त से मेरे परायण हो जा, क्योंकि जिसकी इंद्रियां वश में होती है, उसी की बुद्धि स्थिर होती है।

जो विषयों का चिंतन करता है, उसकी उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति होने से उन विषयों को पाने की कामना उत्पन्न होती है और जब विषयों की प्राप्ति नहीं होती तब क्रोध की उत्पत्ति होती है। क्रोध के कारण मूढ़ता उत्पन्न होती है और मूढ़ता से स्मृति भ्रमित होती है। स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य लक्ष्य से भटक जाता है अर्थात उसका पतन हो जाता है।

Bhagavad Gita Saar in hindi

कृष्ण अर्जुन संवाद

जिसने अपने अंत:करण (मन) को वश में कर लिया है, वह राग-द्वेष रहित इंद्रियों से विषयों में विचरण करता हुआ भी प्रसन्न अंतःकरण वाला होता है। मन, चित्त या अंतःकरण की प्रसन्नता से दुखों का नाश हो जाता है। ऐसे मनुष्य की बुद्धि सभी ओर से विमुख होकर एकमात्र परमात्मा में स्थिर हो जाती है। जिसका मन व इंद्रियां वश में नहीं हैं उसकी बुद्धि स्थिर नहीं होती। ऐसे अस्थिर बुद्धि वाले के मन मे भावना (आस्तिक भाव) भी नहीं होती और भावना न होने से शांति नहीं मिलती। ऐसे अशांतमन मनुष्य को सुख की प्राप्ति कैसे हो सकती है?

जिस प्रकार जल में चलने वाली नौका को वायु अपनी ओर खींच लेती है, उसी प्रकार विषयों में विचरण करने वाली इंद्रियों के मध्य मन जिस किसी इंद्रिय के साथ रहता है, वह एकमात्र इंद्रिय ही अयुक्त मनुष्य की बुद्धि का हरण कर लेती है। इसलिए हे महाबाहो! जिस मनुष्य की इंद्रियां इंद्रियों के विषयों से वियुक्त की हुई हैं अर्थात विषयों से विमुख की जा चुकी हैं, उसी मनुष्य की बुद्धि स्थिर होती है।संसार के सभी जीवों के लिए जो रात्रि होती है उसमें ब्रह्मज्ञानी जागता है, अर्थात ब्रह्मज्ञानी के लिए वह सवेरा है।

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इसके विपरीत जब मायामय संसार का जागरण होता है, तब योगी की रात्रि होती है। जिस प्रकार अनेक नदियों के जल शांत समुद्र में बिना कोई हलचल मचाए समाविष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार संसार के सारे भोग स्थितप्रज्ञ मनुष्य में बिना कोई विकार उत्पन्न किए समाविष्ट हो जाते हैं। ऐसा पुरुष ही परमशांति को प्राप्त होता है, न कि भोगेच्छु। जो मनुष्य सभी कामनाओं का परित्याग करके ममता, अहंकार व स्पृहा से रहित होकर विचरण करता है। उसे ही परम शांति प्राप्त होती है। हे पार्थ! यह स्थिति उस पुरुष की है, जिसने ब्रह्म को पा लिया है। ब्रह्म स्थिति को प्राप्त पुरुष कभी भी मोहित नहीं होता तथा अंतकाल में वह ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानंद को प्राप्त होता है।

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के “Bhagavad Gita Saar in hindi” भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।

श्री भगवद गीत हिन्दी-

A.C. BHAKTIVEDANTA SWAMI PRABHUPAD

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BHAGAVAD GITA Hindi जो आप का जीवन बदल देगी।

श्री Bhagavad Gita Hindi भाषा का एक ग्रंथ है जो जीवन का एक अलग पहेलू अपने सामने रखता है। भगवद गीता मे जो बाते लिखी गई है वो सभी बाते हमारे जीवन का सार है।
Summary

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